भारतीय खेती के विनाश के षड्यंत्र का पर्दाफाश

भारत कभी सोने की चिड़ियाँ हुआ करता था, गाय देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी हुआ करती थी। लेकिन आज हमारी स्थिति इतनी खराब है जिसका एक बड़ा कारण है कि हमारे देश का करोडों रुपया हर वर्ष विदेशों मे जा रहा है और उसके बदले में हमे मिल रहा है बंजर धरती का इनाम और अथाह बेरोजगारी। आज हम जानेंगे कौन है इसका जिम्मेदार और हम कैसे भारत को दोबारा से विश्व गुरु बना सकते हैं।

भारत के विनाश की रणनीति Bharat ke Vinash ki Ranniti

विदेशी ताकतों ने अनुसंधान करके पता लगाया की भारतीय किसान अपने खेतों में जिस गाय के गोबर की खाद का प्रयोग करता है उससे यंहा की धरती की उपजाऊ शक्ति कभी कमजोर नहीं होती तथा गोबर की खाद से जो अन्न व खाद्य पदार्थ पैदा होता है। वह बहुत पोष्टिक एवं ताकतवर होता है । इसलिए यंहा के लोगों मे विशेष ऊर्जा होती है। यही वो बात है जो यंहा के जवानों को नौजवान बनाती है।

kheti ka vinash
vinash

इस बात को ध्यान रख कर विदेशी ताकतों ने विचार किया की क्यों न यंहा की आबादी को, यंहा के जवानों को, यंहा की जमीन की उपजाऊ शक्ति को समाप्त करने के लिए ऐसी रणनीति बनाई जाए कि न रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी। अर्थात हमारी धरती को बंजर बनाने के लिए रसायनिक खाद और जहरीले कीटनाशकों का निर्यात किया जाए। इस षड्यंत्र कि आड़ मे उन्होने दोहरा लाभ उठाया। एक तो उनकी खाद का आयात करने के बदले हमारे देश का धन विदेशों मे चला गया दूसरा जो उनका सबसे महतावपूर्ण उद्देशय हमारी जमीन और जवान को बर्बाद करने का था उसमे वो सफल होने लगे, क्योंकि जब जवानों मे ताकत ही नही रहेगी तो वो लड़ेंगे कैसे।

बंजर जमीन एवं धन निष्कासन Banjar Jameen evm Dhan Nishkasan

अपनी इस नीति को कारगर बनाने के लिए उन्होने हमारे राजनेताओं को धन का लालच देकर अपनी रसायनिक खाद और कीटनाशक दवाएं हमारे देश में निर्यात करना शुरू कर दिया। यह देशवाशियों के लिए सोचने का विषय है कि एक तरफ हमारे कुछ नेता देश का धन चूसने में लगे हुए हैं और दूसरी तरफ खाद के आयात से हमारे देश का धन अपनी जमीन को बंजर बनाते हुए विदेशों मे जा रहा है।

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banjar dharti bt y Sahi Kheti

यंहा इस बात का उल्लेख करना ज्यादा आवश्यक हो जाता है कि जो रसायनिक खाद एवं कीटनाशक विदेशों से हमारे देश में आयात किया जाता है उसे वो देश अपने देश मे इस्तेमाल नहीं करते क्योंकि वो इसका प्रयोग करके इसके दुष्परिणाम देख चुके हैं कि इससे धरती बंजर हो जाती है और रसायनिक खाद से पैदा किए गए अन्न, फसल एवं खाद्य पदार्थों का सेवन करने से मनुष्य को कैंसर, ट्यूमर जैसी प्राणघातक बीमारियाँ होती हैं।

गाय भारत के गौरवमयी अतीत का आधार Gay Bharat ke Gauravmayi Ateet ka Aadhar  

अतीत मे विदेशियों रिसर्च में पाया कि प्रत्येक भारतीय व्यक्ति चाहे उसकी आर्थिक स्थिति कितनी भी खराब क्यों न हो लेकिन उसके खूँटे पे कम से कम एक देशी गाय अवशय बंधी पायी गयी जिसके पौष्टिक एवं स्वस्थयवर्धक दूध, घी, दही और छाछ का सेवन करने से ही भारतीय जवान इतने हष्ट-पुष्ट और ताकतवर हैं तथा इन्ही गायों के बछड़े और बैल खेती, काश्तकारी में हल जोतने,रहट तथा गुड़ और तेल के कोल्हू चलाने के साथ-साथ बैलगाड़ी से बोझा ढोने इत्यादि सभी कार्यों मे देशी गौवंश ही रीढ़ कि हड्डी है।

भारत के गौरव को समाप्त करने का षड्यंत्र Bharat ke Gaurav ko Smapt Karne ka Shadyantr 

इसलिए विदेशियों ने भारतीय गौवंश की उपयोगिता को समाप्त करने के लिए बाज़ार में सिंथेटिक दूध के प्रयोग को बढ़ावा दिया। खेती किसानी के काम में ट्रक्टर और मशीनीकरण को बढ़ावा देकर बैलों कि उपयोगिता को समाप्त करने का षड्यंत्र किया गया। हमारे पूजनीय गौवंश को कत्ल करने के लिए उसके मांस और चमड़े की विश्व मे सबसे अधिक कीमत लगाई गयी।

desi gay
native breed of india

इस घृणित पाप का विदेशों मे निर्यात करने के लिए भी हमारे नेताओं को विदेशी मुद्रा भंडार के रूप मे धन कमाने का लालच दिया गया । इस प्रकार हिंदुस्तान की मैनपावर हमारी पूज्य गऊमाता , धरतीमाता और हमारे देश के जवानों को खोखला करने की जो पॉलिसी विदेशियों ने बनाई थी उसमे आज वे सफल होते दिखाई दे रहे हैं। मांस व चमड़े का विदेशों मे निर्यात करने के कारण प्रतिदिन लाखों की संख्या मे गाय बैलों का बेदर्दी से बूचड़खानों में कत्ल हो रहा है ।

विकास की हक़ीक़त Vikas ki Haqiqat

समाज मे आए बदलाव को देखकर आज यह दावे किए जा रहे हैं कि हमारा देश बहुत तरक्की कर रहा है लेकिन सत्यता यह है कि देश अंदर से दीमक की तरह खोखला हो चुका है। हमारी संस्कृति और मान्यताएं कमजोर पड़ती जा रही हैं । भारतीयता को त्यागकर पाश्चात्य संस्कृति की नकल करने मे हम अंधे हो चुके हैं । यह सब विदेशी सभ्यता एवं खानपान की नकल का परिणाम है। बे मौसमी फल एवं सब्जियाँ पैदा की जा रही हैं। जिसने हमारे खान पान को बिगाड़ दिया है इस प्रकार के खाद्य पदार्थ लेने से हमारा शारीरिक एवं बौद्धिक विकास रुक जाता है।

भारत मे स्वास्थय
भारत मे स्वास्थय की स्थिति by Sahi kheti

औसत आयु

हम नयी-नयी बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। आप सोच सकते हैं कि क्या कारण है जो हमारे दादा कि पीढ़ी के लोग 100 साल तक जीते थे लेकिन आज की पीढ़ी कि औसत आयु 60 साल तक रह गयी है। क्या यही विकास है? आपको नहीं लगता कि इतनी मेडिकल सेवाएँ होने के बावजूद लोग बीमार हो रहें है। आज ऐसा एक भी परिवार नहीं है जिसमे कोई मरीज न हो। क्या आप किसी परिवार को जानते हो जिसने पिछले एक महीने से दवाई न ली हो?

समस्या का निदान Samasya ka Nidan

जो बीमारियाँ विदेशों मे सुनते थे वो आज शहरों की तो बात छोड़िए, गाँव तक पन्हुच चुकी है। जबकि अकेले गौमूत्र से ही बहुत सी बीमारीयां ठीक हो सकती हैं। गाय के स्पर्श मात्र से ही कितने सारे रोग ठीक हो जाते हैं । लेकिन हमने अपनी गऊमाता को विदेशियों के चाल मे फंसकर कुरड़ियों पर पोलिथीन खाने पर मजबूर कर दिया है। विज्ञान कभी भी गौमता कि तरह घास से दूध नहीं बना सकता। जबकि गऊमाता घास खा कर हमें पौष्टिक दूध, माखन दही और गौमूत्र के रूप में औषधियां देती है। इसीलिए हमारे पुराने ग्रन्थों में गऊ को माता का दर्जा दिया गया है।

GIR Cow
one of the best Indian breed

सरकार की ज़िम्मेदारी 

यदि हमारी सरकार द्वारा गऊमाता के विकास का कार्य किया गया होता तो आज किसान कि ये दशा नही होती। यदि गौमूत्र का सही उपयोग किया जाता उसके गुणों के विषय मे शोध किया जाता, उसके उपयोग के लिए नयी तकनीक विकसित की जाती तो आज हमारे किसान और खेती की स्थिति बहुत भिन्न होती। क्योंकि किसान जो खेती के साथ साथ गौपालक भी है, उन्हे खेती करने में कोई लागत ही नहीं लगानी पड़ती, लागत न होने के कारण अनाज और अन्य उत्पाद महेंगे नहीं होते। सरकार को भी किसी प्रकार की आर्थिक सहायता किसान को खाद या बीज के रूप मे नहीं देनी पड़ती। जनता पर टेक्स का बोझ नहीं पड़ता, जिसके परिणामस्वरूप गरीबी और महंगाई दोनों ही नियंत्रण मे रहती और असली विकास के साथ साथ देश में समृद्धि भी बढ़ती।

jevamrit ghol
जीवामृत पौधों की वृद्धि के लिए by सही खेती

देसी गाय के गोबर की उपयोगिता 

जैसे की देशी गाय के पैंतीस ग्राम गोबर से एक एकड़ भूमि को उपजाऊ बनाने की विधि है, जिसे कुछ समय पहले न्यूज़ीलैंड के कृषि तथा पशु वैज्ञानिक पीटर प्रॉक्टर ने भी अपने भारत प्रवास में प्रयोग से सिद्ध किया। और हमारे ऋषि-मुनि सदियों पहले ही इस विधि का प्रयोग करके अपने आश्रम में उच्च गुणवत्ता का अनाज एवं फल उत्पादन किया करते थे। इसे अतीत में ऋषि कृषि के नाम से जाना जाता था। जिसे आज कल कई वैज्ञानिक एवं कृषि विशेषज्ञ प्राकृतिक कृषि या ज़ीरो बजट खेती भी कहते हैं। हमारे किसान भाई बहन भी इस विधि का प्रयोग करके अपना उत्पादन बढ़ा सकते हैं वो भी बिना किसी लागत के।

निष्कर्ष

यदि हम अपनी देशी गऊमाता के दूध, गोबर एवं गौमूत्र की उपयोगिता को समझ लें तो हमारे देश से बीमारी, गरीबी और बेरोजगारी काफी हद तक अपने आप समाप्त हो जाएगी। अत: हमें अपनी देशी गऊमाता की रक्षा करते हुए अपनी भारतीय परंपरा, संस्कृति और सभ्यता को अपनाना चाहिए। जिससे हम अपने देश को दुनिया मे वही स्थान दिला पायें जो हमारे पूर्वजों ने स्थापित किया था।

दोस्तों अगर आपको हमारे द्वारा दी गयी जानकारी अच्छी लगी हो तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करना न भूले क्यूंकी जब हम अपने देश के लिए एक कदम आगे बढ़ाएँगे तभी हमारे साथ वाले भी आगे बढ़ाएँगे। और अपने देश को उन्नति के पथ पर आगे लेकर जाने के लिए आपका ये छोटा सा प्रयास बहुत काम आ सकता है।#जयहिंद!

 

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About Sanjay Kaushik

मैं संजय कौशिक एक किसान, MBA इन मार्केटिंग, M.A. लोक प्रशासन और अर्थशास्त्र की पढ़ाई कर चुका हूँ। ओर मैं पिछले 14 सालों से शिक्षण और प्रशिक्षण के कार्य मे लगा हुआ हूँ। अब मैं डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करके आप सभी तक अपनी मातृभाषा में सही खेती के मंत्र पंहुचाने का प्रयास कर रहा हूँ। उम्मीद है कि आप सभी सहयोग करेंगे!
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